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Tafsīr al-Qurṭubī
सूरह 53

An-Najm

الجامع لأحكام القرآن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

अंश

  1. आयतें 1–10وَٱلنَّجْمِ إِذَا هَوَىٰ
  2. आयतें 11–18مَا كَذَبَ ٱلْفُؤَادُ مَا رَأَىٰٓ
  3. आयतें 19–22أَفَرَءَيْتُمُ ٱللَّـٰتَ وَٱلْعُزَّىٰ
  4. आयतें 23–26إِنْ هِىَ إِلَّآ أَسْمَآءٌ سَمَّيْتُمُوهَآ أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُم مَّآ أَنزَلَ ٱللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَـٰنٍ ۚ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا ٱلظَّنَّ وَمَا تَهْوَى ٱلْأَنفُسُ ۖ وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّن رَّبِّهِمُ ٱلْهُدَىٰٓ
  5. आयतें 27–30إِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْـَٔاخِرَةِ لَيُسَمُّونَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ تَسْمِيَةَ ٱلْأُنثَىٰ
  6. आयतें 31–32وَلِلَّهِ مَا فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَمَا فِى ٱلْأَرْضِ لِيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ أَسَـٰٓـُٔوا۟ بِمَا عَمِلُوا۟ وَيَجْزِىَ ٱلَّذِينَ أَحْسَنُوا۟ بِٱلْحُسْنَى
  7. आयतें 33–35أَفَرَءَيْتَ ٱلَّذِى تَوَلَّىٰ
  8. आयतें 36–42أَمْ لَمْ يُنَبَّأْ بِمَا فِى صُحُفِ مُوسَىٰ
  9. आयतें 43–46وَأَنَّهُۥ هُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَىٰ
  10. आयतें 47–55وَأَنَّ عَلَيْهِ ٱلنَّشْأَةَ ٱلْأُخْرَىٰ
  11. आयतें 56–62هَـٰذَا نَذِيرٌ مِّنَ ٱلنُّذُرِ ٱلْأُولَىٰٓ