Al-Israa
الجامع لأحكام القرآنयह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।
पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया
قَالَ ٱذْهَبْ فَمَن تَبِعَكَ مِنْهُمْ فَإِنَّ جَهَنَّمَ جَزَآؤُكُمْ جَزَآءً مَّوْفُورًا 63
قَوْلُهُ تَعَالَى: قَالَ (اذْهَبْ) هَذَا أَمْرُ إِهَانَةٍ، أي اجهد جهدك فقد أنظرناك أَيْ أَطَاعَكَ مِنْ ذُرِّيَّةِ آدَمَ.
(فَإِنَّ جَهَنَّمَ جَزاؤُكُمْ جَزاءً مَوْفُوراً) أَيْ وَافِرًا، عَنْ مُجَاهِدٍ وَغَيْرِهِ. وَهُوَ نَصْبٌ عَلَى الْمَصْدَرِ، يُقَالُ: وَفَرْتُهُ أَفِرُهُ وَفْرًا، وَوَفَرَ الْمَالُ بِنَفْسِهِ يَفِرُ وُفُورًا فهو وافر، فهو لازم ومتعد.