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Tafsīr al-Baghawī
सूरह 54

Al-Qamar

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यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

अंश

  1. आयत 1ٱقْتَرَبَتِ ٱلسَّاعَةُ وَٱنشَقَّ ٱلْقَمَرُ
  2. आयतें 2–3وَإِن يَرَوْا۟ ءَايَةً يُعْرِضُوا۟ وَيَقُولُوا۟ سِحْرٌ مُّسْتَمِرٌّ
  3. आयतें 4–7وَلَقَدْ جَآءَهُم مِّنَ ٱلْأَنۢبَآءِ مَا فِيهِ مُزْدَجَرٌ
  4. आयतें 8–13مُّهْطِعِينَ إِلَى ٱلدَّاعِ ۖ يَقُولُ ٱلْكَـٰفِرُونَ هَـٰذَا يَوْمٌ عَسِرٌ
  5. आयतें 14–17تَجْرِى بِأَعْيُنِنَا جَزَآءً لِّمَن كَانَ كُفِرَ
  6. आयतें 18–27كَذَّبَتْ عَادٌ فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِى وَنُذُرِ
  7. आयतें 28–31وَنَبِّئْهُمْ أَنَّ ٱلْمَآءَ قِسْمَةٌۢ بَيْنَهُمْ ۖ كُلُّ شِرْبٍ مُّحْتَضَرٌ
  8. आयतें 32–37وَلَقَدْ يَسَّرْنَا ٱلْقُرْءَانَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
  9. आयतें 38–45وَلَقَدْ صَبَّحَهُم بُكْرَةً عَذَابٌ مُّسْتَقِرٌّ
  10. आयतें 46–48بَلِ ٱلسَّاعَةُ مَوْعِدُهُمْ وَٱلسَّاعَةُ أَدْهَىٰ وَأَمَرُّ
  11. आयत 49إِنَّا كُلَّ شَىْءٍ خَلَقْنَـٰهُ بِقَدَرٍ
  12. आयतें 50–53وَمَآ أَمْرُنَآ إِلَّا وَٰحِدَةٌ كَلَمْحٍۭ بِٱلْبَصَرِ
  13. आयतें 54–55إِنَّ ٱلْمُتَّقِينَ فِى جَنَّـٰتٍ وَنَهَرٍ